Friday, 15 February 2019

इस भरोसे पे कर रहा हूँ गुनाह,

इस भरोसे पे कर रहा हूँ गुनाह,
बख़्श देना तो तेरी फ़ितरत है...

जिंदगी तो अपने हिसाब से ही..जीनी चाहिए..

लोगों को खुश रखने के चक्कर में तो..
शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है..


प्यासे रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िर
 मारो ज़मीं पे पाँव कि.. पानी निकल पड़े



Focus on what you want, your expectations, what you are going to do with what you have. Not on what you deserve, what should be given to you without you having worked for it. That’s the difference between average and successful.

मसला ये नहीं है कि दर्द कितना है... 
मुद्दा ये है की परवाह किसको है...!

'जंग' लग न जाये मोहब्बत को कहीं .. 
रूठने मनाने के सिलसिले जारी रखो

उस से मिलो तो सिर्फ इतना कह देना .. 
की हम उसके बग़ैर 'तनहा' नहीं 'अधूरे' हैं

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था....
वो बात उनको बहोत ना-गवार गुज़री है......

जनाजा रोक कर मेरा वह इस अंदाज से बोले....
 हमने तो गली कहीं थीतुमने तो दुनिया ही छोड़ दी........

पहाड़ो पर बैठ कर तप करना सरल है
लेकिन परिवार में सबके बीच रहकर धीरज बनाये रखना कठिन है, और यही तप है

अपनो में रहे, अपने मे नहीं.
सीख उस बालक से लेनी चाहिए जो अपनों की मार खाके अपनों से ही लिपट जाता है..

Tuesday, 12 February 2019

चला था जिक्र:

चला था ज़िक्र ज़माने की बेवफ़ाई का

सो आ गया है तुम्हारा ख़याल वैसे ही

हमें  पता  है  तुम 
कहीं  और  के मुसाफिर  हो

हमारा  शहर तो यूँही 
रास्ते में  आया था ..!!

न तो कुछ फ़िक्र में हासिल है न तदबीर में है

वही होता है जो इंसान की तक़दीर में है..

"दिल को हारना तो सिखा दिया है मैंने

पर ये कम्बख़्त लड़ना भी तो नहीं भूलता...."

खुशी के फूल उन्हीं के दिलों में खिलते हैं,

जो अपने  की तरह अपनों  से मिलते हैं..

हर रोज मिलता हुँ:

हर रोज़ मिलता हूँ हर रोज़ की तरह

बस बात इतनी सी है
कि अब वो बात नही ।।

शाम तक सुबह की नज़रो से उतर जाते है

इतने समझौतो पे जीते है कि मर जाते है…!!

ये व्यक्तित्व की गरिमा है कि फूल कुछ नही कहते

वरना कभी कांटों को मसलकर दिखाईये.....

अपनी सहूलियतों से ,  चलते रहे वो

और हम समझे , हमारे रहगुज़र हैं वो

मशहूर होने का शौक किसे है साहब......

हमें तो हमारे "अपने" ही ठीक से पहचान लें, इतना ही काफी है।

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए|

Friday, 1 February 2019

सुख ऐसा भी होता है:

सुख ऐसे ही हैं।उम्र के साथ बदल जाते हैं

मैने सुना है,एक मुसाफिरखाने में तीन यात्री मिले।एक बूढ़ा था साठ साल का, एक कोई पैंतालीस साल का अधेड़ आदमी था और एक कोई तीस साल का जवान था। तीनों बातचीत में लग गये। उस जवान आदमी ने कहा कि कल रात एक ऐसी स्त्री के साथ मैंने बितायी कि उससे सुंदर स्त्री संसार में नहीं हो सकती, और जो सुख मैंने पाया वह अवर्णनीय है।

पैंतालीस साल के आदमी ने कहा. ‘छोड़ो बकवास! बहुत स्त्रियां मैंने देखी हैं। वे सब अवर्णनीय जो सुख मालूम पड़ते हैं, कुछ अवर्णनीय नहीं हैं। सुख भी नहीं है। सुख मैंने जाना कल रात। राजभोज में आमंत्रित था। ऐसा सुस्वादु भोजन कभी जीवन में जाना नहीं।’ साठ साल के आदमी ने कहा. ‘यह भी बकवास है। असली बात मुझसे पूछो। आज सुबह ऐसा दस्त हुआ, पेट इतना साफ हुआ कि ऐसा आनंद मैंने कभी जाना नहीं; अवर्णनीय है।’ बस, संसार के सब सुख ऐसे ही हैं। उम्र के साथ बदल जाते हैं; लेकिन तुम ही भूल जाते हो। तीस साल की उम्र में कामवासना बड़ा सुख देती मालूम पड़ती है। पैंतालीस साल की उम्र में भोजन ज्यादा सुखद हो जाता है। इसलिए, अक्सर चालीस पैंतालीस के पास लोग मोटे होने लगते हैं। साठ साल के करीब भोजन में कोई रस नहीं रह जाता, सिर्फ पेट ठीक से साफ हो जाए..! तो जो समाधि सुख मिलता है, वह किसी और चीज में। तीनों ही ठीक कह रहे हैं, क्योंकि संसार के सुख बस ऐसे ही हैं। और इन सुखों के लिए हमने कितने जीवन गंवाये हैं। और ये मिल भी जाएं तो भी कुछ नहीं मिलता। क्या मिलेगा? -ओशो"

Wednesday, 30 January 2019

प्रयत्न करने से कभी न चूकें..!

प्रयत्न करने से कभी न चूकें..!
हिम्मत नहीं तो प्रतिष्ठा नहीं,
   
विरोधी नहीं तो प्रगति नहीं..

 जबसे वो 'खूब' बन बैठे हैं,
दिल का मिज़ाज 'वाह वाह' है साहिब !!

कह देना समन्दर से हम ओस के मोती हैं,
दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएंगे...

बेइजाज़त, बेवजह, बेसबब, खामखां,
बेलगाम इश्क़ यूँ ही हो जाता है बेपनाह

थक गया होगा ...कागज़ तक पहुंचा नहीं ...
ज़ेहन से चल कर निकला तो था ...
ख़्याल था तुम्हारा ...थक गया होगा ...
आज मैंने फिर जज़्बात भेजे,
आज तुमने फिर अल्फ़ाज़ ही समझे

खुशियों का कोई रास्ता नहीं..

खुशियों का कोई  रास्ता नहीं..
खुश रहना ही रास्ता है..
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तूफ़ान कर रहा था मेरे अज़्म का तवाफ़*,
दुनिया समझ रही थी कश्ती भंवर में है !!
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  *परिक्रमा
An excuse is a lie dressed up as a reason.



अफ़वाह थी कि कोई तस्वीर छपी है उनकी.
सुबह से ही हम सारे अखबार लिये बैठे हैं.

मेरे तो दर्द भी औरों के काम आते हैं,
मैं रो पडूँ तो कई लोग मुस्कराते है।

यही कह देते हैं अब तुझसे बिछड़ कर ख़ुश हैं
और कुछ  इसके सिवा भी तो नहीं कह सकते

दुनिया समझ में आई मगर आई देर से,
कच्चा बहुत था रंग उतरता चला गया...

तुम हैरान कर दो, हाल पूछ कर हमारा,
बता के सब खैरियत, हम भी कमाल कर देंगे

इक बात इख़्तियार से बाहर जो थी उसे,

 इक बात इख़्तियार से बाहर जो थी उसे,
किस ख़ूबसूरती से तमन्ना कहा गया !!

Person who angers you, controls you.
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A dream without a plan is called a wish
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गुनाह कुछ हमसे हो गए यूँ अनजाने में....
फूलों का कत्ल कर दिया पत्थरों को मनाने में
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मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ
हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने...
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चाहूँ तो अब भी जानिब-ए-मंज़िल पलट चलूँ,
ग़ुमराह इसलिये हूँ कि रहबर ख़फा न हो...
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हँसी की वजह हैं कुछ लोग। जिनसे रौशन हमारी छोटी सी दुनिया है।
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रूह पर भी, दाग़ आ जाता है।
जब दिलों में दिमाग़ आ जाता है।
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डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

 [8:11 AM, 8/24/2023] Bansi Lal: डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा [8:22 AM, 8/24/2023] Bansi La...