Monday, 14 December 2015

GOD'S COFFEE !!!

Are you enjoying your Coffee….. a small story with a lesson..

A group of alumni, highly established in their careers, got together to visit their old university professor.

 Conversation soon turned into complaints about stress in work and life.

Offering his guests coffee, the professor went to the kitchen and returned with a large pot of coffee and an assortment of cups – porcelain, plastic, glass, crystal, some plain looking, some expensive, some exquisite – telling them to help themselves to the coffee.

When all the students had a cup of coffee in hand, the professor said:

“If you noticed, all the nice looking expensive cups were taken up, leaving behind the plain and cheap ones. While it is normal for you to want only the best for yourselves, that is the source of your problems and stress.

Be assured that the cup itself adds no quality to the coffee. In most cases it is just more expensive and in some cases even hides what we drink.

What all of you really wanted was coffee, not the cup, but you consciously went for the best cups… And then you began eyeing each other’s cups.

Now consider this: Life is the coffee;

the jobs, money and position in society are the cups.

They are just tools to hold and contain Life,

and the type of cup we have does not define nor change the quality of Life we live.

Sometimes, by concentrating only on the cup, we fail to enjoy the coffee God has provided us.”

God brews the coffee, not the cups………. Enjoy your coffee!

To elaborate further, we are bombarded everywhere we look by the trappings of Life, the coffee cups in this story.  When we turn on the television, we are told over and over that to be happy we must have this new car, that newest gadget, those most mouth-watering and fattening foods…..oh, the message may not be that blatant, but the implication is there.  Have you noticed that there seem to be more ads in magazines than there are articles?  Billboards scream at us as we travel in our cars.  Radios blare their promos more and more frequently until sometimes it is hard to find the music you are searching for.

But is that what is really important in life?  The stuff?  “What is your life? You are a mist that appears for a little while and then vanishes.”  In the big scheme of history, our individual lives are like a mist, here one minute and gone the next.  So, to make our life matter, what do we do while we are here?  Do we accumulate a lot of glittery stuff, a legacy of things? Although stuff is nice, I don’t think that should be our focus.

In the end of the year cards or on Teacher Appreciation Day, the following poem is often seen -

One hundred years from now

It won’t matter What kind of car I drove

 What kind of house I lived in

How much money I had in the bank

 Nor what my clothes looked like

BUT the world may be a little better

Because I was important In the life of a child.

 The message in the poem is even larger than the teacher/child relationship.  The message, and the key to the importance of Life, is relationships.   It is a critical one!   Over the next few days, think about this topic.  Stop for a while and meditate on it.

घमंड छोड़ो:


महाभारत का युद्ध चल रहा था।
अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे।

जैसे ही अर्जुन का बाण छूटता,
कर्ण का रथ दूर तक पीछे चला जाता।

जब कर्ण का बाण छूटता,
तो अर्जुन का रथ सात कदम पीछे चला जाता।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन की प्रशंसा के स्थान पर
कर्ण के लिए हर बार कहा...
कितना वीर है यह कर्ण?

जो उनके रथ को सात कदम पीछे धकेल देता है।

अर्जुन बड़े परेशान हुए।
असमंजस की स्थिति में पूछ बैठे...

हे वासुदेव! यह पक्षपात क्यों?
मेरे पराक्रम की आप प्रशंसा नहीं करते...
एवं मात्र सात कदम पीछे धकेल देने वाले कर्ण को बारम्बार वाहवाही देते है।

श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन तुम जानते नहीं...

तुम्हारे रथ में महावीर हनुमान...
एवं स्वयं मैं वासुदेव कृष्ण विराजमान् हैं।

यदि हम दोनों न होते...
तो तुम्हारे रथ का अभी अस्तित्व भी नहीं होता।

इस रथ को सात कदम भी पीछे हटा देना कर्ण के महाबली होने का परिचायक हैं।

अर्जुन को यह सुनकर अपनी क्षुद्रता पर ग्लानि हुई।

इस तथ्य को अर्जुन और भी अच्छी तरह तब समझ पाए जब युद्ध समाप्त हुआ।

प्रत्येक दिन अर्जुन जब युद्ध से लौटते...
श्रीकृष्ण पहले उतरते,
फिर सारथी धर्म के नाते अर्जुन को उतारते।

अंतिम दिन वे बोले-अर्जुन...
तुम पहले उतरो रथ से व थोड़ी दूर जाओ।

भगवान के उतरते ही रथ भस्म हो गया।

अर्जुन आश्चर्यचकित थे।
भगवान बोले-पार्थ...
तुम्हारा रथ तो कब का भस्म हो चुका था।

भीष्म,

कृपाचार्य,

द्रोणाचार्य

कर्ण के

दिव्यास्त्रों से यह नष्ट हो चुका था।
मेरे संकल्प ने इसे युद्ध समापन तक जीवित रखा था।

अपनी श्रेष्ठता के मद में चूर अर्जुन का अभिमान चूर-चूर हो गया था।

अपना सर्वस्व त्यागकर वे प्रभू के चरणों पर नतमस्तक हो गए।
अभिमान का व्यर्थ बोझ उतारकर हल्का महसूस कर रहे थे...

गीता श्रवण के बाद इससे बढ़कर और क्या उपदेश हो सकता था कि सब भगवान का किया हुआ है।
हम तो निमित्त मात्र है।
काश हमारे अंदर का अर्जुन इसे समझ पायें।

घमंड जीवनमें कष्ट ही देता है।
अभिमान छोडो लेकिन स्वाभिमान के लिए लडते रहो.....

अन्न बरबाद मत करो:


जर्मनी एक उच्च औद्योगिक देश है। अपने लोग वंहा  आलीशान जिंदगी के बारे में सोचते हैं।
हमने वंहा खाना खाते हुए एक युवा जोड़े को देखा जो वहां भोजन कर रहा था। उनकी प्लेट में केवल दो व्यंजन और मेज पर juice के दो डिब्बे थे। क्या ऐसा साधारण भोजन रोमांटिक हो सकता है।
एक और टेबल पर कुछ बुढ़ी महिलाएं थी.. उनकी प्लेट में भी भोजन के १-२ बिट्स थे..
हम भूखे थे, तो हमने अधिक भोजन का आदेश दिया.. हमारे द्वारा भोजन कर लेने के बाद मेज पर भोजन का एक तिहाई हिस्सा अभी भी झुठा बच गया था..
जब हम रेस्तरां से जाने लगे तोे कुछ बुढ़ी महिलाओं ने हमसे  अंग्रेजी में बात की, हम समझ गए थे कि वे हमें इतना भोजन बर्बाद कर देने के बारे में दुखी थे..
मेरे सहयोगी ने उन बुढ़ी महिलाओं को बताया, "हमने अपने भोजन के लिए भुगतान किया है, यह हम पर छोड़ दो कि हमें कितना खाना है ।
लेकिन बुढ़ी महिलाएं गुस्से में थी.. उनमें से एक ने तुरंत अपने हाथ में फोन  लेकर और किसी को फोन किया। थोड़ी देर के बाद, सामाजिक सुरक्षा संगठन से वर्दी में एक आदमी आ गया । विवाद क्या था जानने पर, उसने हम पर 50 यूरो जुर्माना जारी कर दिया.. हम सब चुप रहे।
एक अधिकारी ने कठोर आवाज में हमें बताया, "आप जितना उपभोग कर सकते हैं उतना ओर्डर दिजीये , हालांकी पैसा तुम्हारा है लेकिन संसाधनों पर समाज का भी उतना ही हक जितना की आपका.. 
दुनिया में बहुत से लोग संसाधनों की कमी का सामना कर रहे है..
आप संसाधनों को इस तरह से बर्बाद नहीं कर सकते..
इस समृद्ध देश के लोगों की मानसिकता ने हम सबको शर्म में डाल दिया। हमें वास्तव में इस पर चिंतन करने की जरूरत है।
हमारा देश संसाधनों में बहुत अमीर नहीं है, अपनी शान दिखाने के लिए हम बड़ी मात्रा में ओर्डर दे देते हैं और कई लोगों का भोजन बर्बाद कर देते हैं यह सही है कि "पैसा तुम्हारा है लेकिन संसाधन समाज के लिए हैं और समाज का भी उतना ही अधिकार है " ।

Friday, 11 December 2015

विश्वास

एक आदमी कि है जो एक लम्बी हवाई यात्रा करके आ रहा था।
हवाई यात्रा ठीक ठाक चल रही थी तभी एक उदघोष हुआ कि कृपया अपनी सीट बेल्ट बांध लें क्योंकि कुछ समस्या आ सकती है। तभी एक और उदघोष हुआ कि , " मौसम खराब होने के कारण कुछ गड़बड़ी होने की सम्भावना है अतः हम आपको पेय पदार्थ नहीं दे पाएंगे। कृपया अपनी सीट बेल्ट्स कस कर बांध लें। " जब उस व्यक्ति ने अपने चारों ओर अन्य यात्रियों की ओर देखा तो पाया कि वे किसी अनिष्ट की आशंका से थोड़े भयभीत लग रहे थे। कुछ समय के पश्चात फिर एक उदघोष हुआ, " क्षमा करें, आगे मौसम ख़राब है अतः हम आपको भोजन की सेवा नहीं दे सकेंगे। कृप्या अपनी सीट बेल्ट बांध लें ।" और फिर एक तूफ़ान सा आ गया। बिजली कड़कने और गरजने की आवाजें हवाई जहाज़ के अन्दर तक सुनायी देने लगीं। बाहर का ख़राब मौसम और तूफ़ान भी भीतर से दिखाई दे रहा था। हवाई जहाज़ एक छोटे खिलौने की तरह उछलने लगा। कभी तो जहाज़ हवा के साथ सीधा चलता था और कभी एकदम गिरने लगता था जैसे कि ध्वस्त हो जायेगा।

वह व्यक्ति बोला की अब वह भी अत्यंत भयभीत हो रहा था और सोंच रहा था कि यह जहाज़ इस तूफ़ान से सुरक्षित निकल पायेगा अथवा नहीं। फिर जब उसने अपने चारों ओर अन्य यात्रियों की ओर देखा तो उसने पाया कि सब ओर भय और असुरक्षा का सा माहौल बन चुका था। तभी उसने देखा कि एक सीट पर एक छोटी सी लड़की सीट पर पैर ऊपर करके आराम से बैठी एक पुस्तक पढ़ने में डूबी हुयी थी। उसके चेहरे पर चिंता की कोई शिकन तक नहीं थी। वह कभी-कभी कुछ क्षड़ो के लिए अपनी ऑंखें बंद करती और फिर आराम से पढने लग जाती थी। जब सभी यात्री भयाक्रांत हो रहे थे, जहाज़ उछल रहा था तब भी यह लड़की भय एवं चिन्ता से कोसों दूर थी और आराम से पढ़ रही थी। उस व्यक्ति को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ और जब वह जहाज़ अन्ततः सुरक्षित उतर गया। वह व्यक्ति सीधे उस लड़की के पास गया और उसने उससे पूँछा, कि इतनी खतरनाक परिस्तिथियों में भी वह बिलकुल नहीं डरी और एकदम शान्त किस प्रकार बनी हुयी थी। इस पर उस लड़की ने उत्तर दिया, " सर मेरे पिताजी इस विमान के चालक थे और वो मुझे घर ले जा रहे थे।
ऐसे ही अगर हम भगवान पर विश्वास करे तो हम कभी परेशान नहीं हो सकते क्यूंकि भगवान खुद वायदा करते है कि आप बच्चे बस एक कदम बढाओ तो मै आप बच्चों की तरफ हजार कदम बढ़ाएगे।

Wednesday, 9 December 2015

चलो ऐसे भी सही:

Bansi: '

गिला..जब भी किसी से किया जाये,
🌁🌁🌁🌁🌁🌁🌁🌁🌁
बेहतर होगा उस वक़्त थोड़ा सा हँस दिया जाये'

Bansi:

जिन्दगी धुएँ की मानिंद उड़ती रही...
🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃
कभी खुद पे, कभी मुझ पे हँसती रही...
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

हल्की-फुल्की
सी है जिंदगी...

वज़न तो
ख्वाहिशों का ही है...!

🍃🍁🌹🍃🍁🍃

Bansi:
🌾💐🌾💐🌾💐🌾

ज़िदगी जीना तुमने सिखाया

वरना हम तो मिटटी के पुतले थे"

Bansi:

मेरी आवारगी में कुछ दख़ल तुम्हारा भी है
🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿

Bansi:

काँच के टुकड़े बनकर बिखर गयी है ज़िन्दगी !!
💐💐💐💐💐💐💐💐💐
किसी ने समेटा ही नहीं ...
ज़ख़्मी होने के डर से...!!

Bansi:

ये जो रिश्वतों का दौर चल रहा है जहां में..
तुम भी कुछ ले - देके मेरे क्यों नही हो जाते..!
🌾💐🌾💐🌾💐🌾💐🌾💐

Bansi:

चलो बिखरने देते हैं जिन्दगी को....
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
सँभालने की भी तो एक हद होती है....

Bansi:

हज़ारो दर्द को सहकर भी कैसे मुस्कुरा जाती है
🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
"माँ" ही है जो फरिश्तों को भी फरिश्तों सी नज़र आती है

Bansi:

जिंदगी तुझसे हर कदम पर समझौता क्यों किया जाय…
🍷🍷🍷🍷🍷🍷🍷🍷🍷🍷
शौक जीने का है मगर इतना भी नहीं…
कि मर मर कर जिया जाए…!!

Bansi:

उनके भी कत्ल का इलज़ाम हमारे सर है,
जो हमे ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं
💉💉💉💉💉💉💉💉💉💉

You don't know your value untilyou are pushed:

A man had only one daughter.
When the daughter was of marriage age,
the father sent news around town that all the eligible young men should come to compete in a test which would determine who was fit to marry his daughter. On the set day, all the able-bodied young men came out. Some came with paper and pen and others with cutlasses and swords.
The rich man took them to his swimming pool
and addressed the men: “Any of you who can swim from one end of this swimming pool to the other would marry my daughter. In addition, I‘ll give him 15 million
naira, a car and a house so they can start life well. I shall be waiting
to meet my son-in-law at the other side. Good luck!”
As the young men, all very excited at the prospect of winning, started taking off their shirts, a helicopter
came over the pool
and dropped snakes and crocodiles into the
pool. Immediately, all the men turned back and started wearing their
shirts again. Disappointed, some of
them said, ''That's crazy, no one will'. All of a sudden,they heard a splash in the pool.
Everybody watched in amazement as one gentleman struggled his way across, avoiding the snakes and crocodiles. Finally, he made it to the
other side. The rich man could not believe it. He asked the young man to name anything he wanted but the man was still panting uncontrollably.
Finally, he got himself together and made a
request saying, ''SHOW ME THE PERSON WHO
PUSHED ME INSIDE THIS POOL!''
Moral: You don’t know what you are capable of doing, until you are
PUSHED!!.
Sometimes it takes going through the bad moments to bring out d BEST in us. Trials are raw materials for Triumphant Testimonies... The
push might take different
dimensions: some people needed to be sacked before realizing their potentials and reaching their goals in life.
I PRAY SOMEONE OR SOMETHING WILL
PUSH U TOWARDS YOUR SUCCESS.

Tuesday, 8 December 2015

बन्दरों सा व्यव्हार मत करो:

एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही रोचक प्रयोग किया..

उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक  सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..

जैसा की अनुमान था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..

पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..

पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..

बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..

पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..

अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..

और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..

एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...

थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..

बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..

अब वैज्ञानिकों ने एक और मजेदार चीज़ की..

अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..

नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..

वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..

पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..

उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर खुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..

कुछ समय बाद उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..

इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..

इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!

प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..

पर उनका व्यवहार भी पुराने बंदरों की तरह ही था..

वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..

दोस्तों, हमारे समाज में भी ये व्यव्हार देखा जा सकता है..

जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, बिज़नस, राजनीती, समाजसेवा या किसी और फील्ड से रिलेटेड हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..

उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..

और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकांश वो होते हैं जिन्होंने जीवन में उस फील्ड में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..

इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का अपोजिशन फेस करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..

अपने ज्ञान और काबलियत की सुनिए..
और अपने लक्ष्य पर ध्यान करके आगे बढिए...
और बढ़ते रहिये..

कुछ बंदरों के व्यवहार के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए..

डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

 [8:11 AM, 8/24/2023] Bansi Lal: डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा [8:22 AM, 8/24/2023] Bansi La...