Tuesday, 8 December 2015

बन्दरों सा व्यव्हार मत करो:

एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही रोचक प्रयोग किया..

उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक  सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..

जैसा की अनुमान था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..

पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..

पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..

बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..

पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..

अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..

और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..

एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...

थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..

बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..

अब वैज्ञानिकों ने एक और मजेदार चीज़ की..

अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..

नया बन्दर वहां के नियम क्या जाने..

वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..

पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..

उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर खुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..

कुछ समय बाद उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..

इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..

इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!

प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..

पर उनका व्यवहार भी पुराने बंदरों की तरह ही था..

वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..

दोस्तों, हमारे समाज में भी ये व्यव्हार देखा जा सकता है..

जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, बिज़नस, राजनीती, समाजसेवा या किसी और फील्ड से रिलेटेड हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..

उसे असफलता का डर दिखाया जाता है..

और मजेदार बात ये है कि उसे रोकने वाले अधिकांश वो होते हैं जिन्होंने जीवन में उस फील्ड में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..

इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का अपोजिशन फेस करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..

अपने ज्ञान और काबलियत की सुनिए..
और अपने लक्ष्य पर ध्यान करके आगे बढिए...
और बढ़ते रहिये..

कुछ बंदरों के व्यवहार के आगे आप भी बन्दर मत बन जाइए..

Friday, 4 December 2015

माँ:

एक औरत थी,
जो अंधी थी,
जिसके कारण उसके बेटे को
स्कूल
में बच्चे चिढाते थे,
कि अंधी का बेटा आ गया,
हर बात पर उसे ये शब्द
सुनने
को मिलता था कि "अन्धी
का बेटा" .
इसलिए वो अपनी माँ से
चिडता था . उसे
कही भी अपने
साथ लेकर जाने में
हिचकता था
उसे नापसंद करता था..
उसकी माँ ने उसे पढ़ाया..
और उसे इस लायक बना
दिया की वो अपने पैरो
पर
खड़ा हो सके..
लेकिन जब वो बड़ा आदमी
बन
गया तो अपनी माँ को
छोड़
अलग रहने लगा..
एक दिन एक बूढी औरत
उसके घर
आई और गार्ड से बोली..
मुझे तुम्हारे साहब से
मिलना है जब गार्ड ने
अपने मालिक से
बोल तो मालिक ने कहा
कि बोल
दो मै अभी घर पर नही हूँ.
गार्ड ने जब बुढिया से
बोला कि वो अभी नही
है..
तो वो वहा से चली
गयी..!!
थोड़ी देर बाद जब लड़का
अपनी कार से
ऑफिस के लिए
जा रहा होता है..
तो देखता है कि सामने
बहुत भीड़
लगी है..
और जानने के लिए कि वहा
क्यों भीड़
लगी है वह
वहा गया तो देखा उसकी
माँ वहा मरी पड़ी थी..
उसने
देखा की उसकी मुट्ठी में
कुछ है उसने जब
मुट्ठी खोली तो देखा की
एक
लेटर जिसमे यह
लिखा था कि बेटा जब तू
छोटा था तो खेलते वक़्त
तेरी आँख में सरिया धंस
गयी थी और तू
अँधा हो गया था तो मैंने
तुम्हे
अपनी आँखे दे दी थी..
इतना पढ़ कर लड़का जोर-
जोर से
रोने लगा..
उसकी माँ उसके पास नही

सकती थी..
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वक़्त रहते ही
लोगो की वैल्यू
करना सीखो..
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माँ-बाप का कर्ज हम
कभी नही चूका सकते.
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हमारी प्यास का अंदाज़
भी अलग है
कभी समंदर को ठुकरा देते
है,
तो कभी आंसू तक पी जाते
है..!!!
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"बैठना भाइयों के बीच,
चाहे "बैर" ही क्यों ना
हो..
और खाना माँ के हाथो
का,
चाहे "ज़हर" ही क्यों ना
हो..!!...
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परमात्मा प्राप्ति:

एक राजा था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।
वह नित्य अपने इष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।
एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा---"राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?"
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला---"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हॆ।आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति हॆ। फिर भी मेरी एक ईच्छा हॆ कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है ।" ---भगवान ने राजा को समझाया ।परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले,--"ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।"
राजा अत्यन्त प्रसन्न. हुअा और भगवान को धन्यवाद दिया।
अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें।
दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो,इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।
परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ एक प्रजा तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गयी और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे।
राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे।उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है । चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें
इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया।अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।
अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे।राजा रानी से कहने लगे---"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हॆ। भगवान के सामने सारी दुनियां कि दौलत क्या चीज हॆ?" सही बात है--रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे।
कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड हॆ।अब तो रानी से रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी,और हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी।यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।
वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे।राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा --"कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ।"
राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।तब भगवान ने राजा को समझाया--
"राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हॆ, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हैं।

Thursday, 3 December 2015

The Cookies Thieves:

.A woman was waiting at an airport one night, with several long hours before her flight. She hunted for a book in the airport shops, bought a bag of cookies and found a place to drop..

She was engrossed in her book but happened to see, that the man sitting beside her, as bold as could be. . .grabbed a cookie or two from the bag in between, which she tried to ignore to avoid a scene. So she munched the cookies and watched the clock, as the gutsy cookie thief diminished her stock..She was getting more irritated as the minutes ticked by, thinking, “If I wasn’t so nice, I would blacken his eye.”

With each cookie she took, he took one too, when only one was left, she wondered what he would do..With a smile on his face, and a nervous laugh, he took the last cookie and broke it in half. He offered her half, as he ate the other, she snatched it from him and thought… oooh, brother. This guy has some nerve and he’s also rude, why he didn’t even show any gratitude!.

She had never known when she had been so galled, and sighed with relief when her flight was called. She gathered her belongings and headed to the gate, refusing to look back at the thieving ingrate. She boarded the plane, and sank in her seat, then she sought her book, which was almost complete..

As she reached in her baggage, she gasped with surprise, there was her bag of cookies, in front of her eyes. If mine are here, she moaned in despair, the others were his, and he tried to share..

Too late to apologize, she realized with grief, that she was the rude one, the ingrate, the thief..

Judgemental -Something we people/humans cannot stop to be. Some people like doing it for the superiority they feel, but others feel bad in doing this. Now if you do feel bad for doing this, it means you have a heart and you know what the person you just judged feels. People have heartsᅳwell, most of them do !

We often judge people without realizing it.  Regardless of the reason, we don’t have a right to judge anyone. Most people don’t notice their own mistakes, instead they strive to find and point out someone else’s mistakes. Take a look at a few of the most important reasons why you should break a habit of judging other people - 

1. Incomplete Information

2. We are all different

3. No one is Perfect  

4. Do unto others as you would have do unto you

5. Tolerance

6. Appearances are often deceptive

7. Respect

8. You define yourself

 There are many reasons why we shouldn’t judge other people. Many of us are guilty of it, but once you realize that judging others is one of your bad habits, you will know what to do. 

कभी ऐसा भी सही:


एक मीटिंग के बाद मैं होटल से बाहर आई। मैंने अपनी कार की चाबियाँ तलाशीं लेकिन मेरे पास नहीं थीं। वापस मीटिंग रूम में जाकर देखा, वहाँ भी नहीं थीं।

अचानक मुझे लगा कि, चाबियाँ शायद मैं कार के इग्नीशन में ही लगी छोड़ आई थी। मेरे पति बहुत बार मेरी इस आदत के लिए मुझे डाँट चुके थे।
जबकि मेरा कहना ये होता था कि, चाबियों को कहीं और भूल जाने की अपेक्षा, इग्नीशन में लगी छोड़कर भूल जाना अच्छा।
उनका कहना ये होता था कि, इग्नीशन में चाबियाँ भूलने पर गाड़ी चोरी हो सकती है।

खैर, जब मैं पार्किंग में पहुँची तो मुझे समझ आया कि, मेरे पति सही थे। पार्किंग खाली थी, कार चोरी हो चुकी थी।

मैंने तुरंत पुलिस को कॉल किया, अपनी लोकेशन और पार्किंग एड्रेस बताया और कार की पूरी जानकारी दी।
मैं बराबर कन्फ्यूज थी कि, चाबियाँ इग्नीशन में भूल जाने के कारण ही कार चोरी हो गई थी।

फिर मैंने अपने पति को डरते डरते काल लगाईं और बोली---" डार्लिंग ( ऐंसे समय मैं उन्हें डार्लिंग कहकर ही बुलाती थी ) मैं अपनी कार की चाबियाँ इग्नीशन में भूल गई और अपनी कार चोरी हो गई। "

फोन पर थोड़ी देर शान्ति रही। मुझे लगा मेरे पति गुस्से में फोन काट देंगे। लेकिन फिर उनकी गुस्से में चिल्लाने की आवाज आई---" बेवकूफ, गधी, मैं खुद तुम्हे मीटिंग अटेंड करने के लिए होटल छोड़कर आया था ! "

अब शांत रहने की मेरी बारी थी। मैं खुश हो गई थी कि, चलो कार चोरी तो नहीं हुई। फिर मैंने कहा---" ओके, तो फिर प्लीज, मुझे लेने के लिए आ जाओ। "

पति फिर चिल्लाए---" मैं जितनी जल्दी हो सकेगा, तुम्हें लेने के लिए पहुँचता हूँ, लेकिन पहले इस पुलिस वाले को तो बताओ, कि मैंने तुम्हारी कार नहीं चुराई है, जिसने मुझे पकड़ रखा है...."

Wednesday, 2 December 2015

संवेदनशीलता:


एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,"चिट्ठी ले लीजिये।"अंदर से एक बालिका की आवाज आई,"आ रही हूँ।"लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,"अरे भाई!मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।"लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।"पोस्टमैन ने कहा,"नहीं,मैं खड़ा हूँ,रजिस्टर्ड चिट्ठी है,पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।"करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला।पोस्टमैन इस देरी के लिए  झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही,लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया,सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे,सामने खड़ी थी।पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया।हफ़्ते,दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती,पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता।एक दिन उसने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा।दीपावली नजदीक आ रही थी।उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे,उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया।अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये।दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना?पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। उसने दरवाजा खटखटाया।अंदर से आवाज आई,"कौन?"पोस्टमैन,उत्तर मिला।बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,"अंकल,मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।"पोस्टमैन ने कहा,"तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो,तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?"कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।"ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया।बालिका ने कहा,"अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना।घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया,क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे।उसकी आँखें भर आई।अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,"आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा।उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?"

संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना,अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।

Tuesday, 1 December 2015

मनुष्य की कीमत आंकना बहुत मुश्किल है, वो तो अनमोल है:

लोहे की दुकान में अपने पिता के साथ काम कर रहे एक बालक ने अचानक ही अपने पिता से पुछा – “पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की क्या कीमत होती है ?”
पिताजी एक छोटे से बच्चे से ऐसा गंभीर सवाल सुन कर हैरान रह गये.
फिर वे बोले “बेटे एक मनुष्य की कीमत आंकना बहुत मुश्किल है, वो तो अनमोल है.”
बालक – क्या सभी उतना ही कीमती और महत्त्वपूर्ण हैं ?
पिताजी – हाँ बेटे.
बालक कुछ समझा नही उसने फिर सवाल किया – तो फिर इस दुनिया मे कोई गरीब तो कोई अमीर क्यो है? किसी की कम रिस्पेक्ट तो कीसी की ज्यादा क्यो होती है?
सवाल सुनकर पिताजी कुछ देर तक शांत रहे और फिर बालक से स्टोर रूम में पड़ा एक लोहे का रॉड लाने को कहा.
रॉड लाते ही पिताजी ने पुछा – इसकी क्या कीमत होगी?
बालक – 200 रूपये.
पिताजी – अगर मै इसके बहुत से छोटे-छटे कील बना दू तो इसकी क्या कीमत हो जायेगी ?
बालक कुछ देर सोच कर बोला – तब तो ये और महंगा बिकेगा लगभग 1000 रूपये का .
पिताजी – अगर मै इस लोहे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो?
बालक कुछ देर गणना करता रहा और फिर एकदम से उत्साहित होकर बोला ” तब तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा हो जायेगी.”
फिर पिताजी उसे समझाते हुए बोले – “ठीक इसी तरह मनुष्य की कीमत इसमे नही है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है.”
बालक अपने पिता की बात समझ चुका था .
अक्सर हम अपनी सही कीमत आंकने मे गलती कर देते है. हम अपनी present status को देख कर अपने आप को valueless समझने लगते है. लेकिन हममें हमेशा अथाह शक्ति होती है. हमारा जीवन हमेशा सम्भावनाओ से भरा होता है. हमारी जीवन मे कई बार स्थितियाँ अच्छी नही होती है पर इससे हमारी Value कम नही होती है. मनुष्य के रूप में हमारा जन्म इस दुनिया मे हुआ है इसका मतलब है हम बहुत special और important हैं . हमें हमेशा अपने आप को improve करते रहना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में बढ़ते रहना चाहिये.

डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

 [8:11 AM, 8/24/2023] Bansi Lal: डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा [8:22 AM, 8/24/2023] Bansi La...